मानव मन और जिज्ञासा

मानव मन सदियों से जिज्ञासाओं की खोज में रहा है। वह अनन्त प्रश्नों की बौछारों से भीगता रहा है,जो चिरंतन आज भी जारी है। वह हर जिज्ञासा में स्वयं की संतुष्टि को तलाशता रहा है। उसके हर समाधान में अतृप्त रह जाने वाली तीक्ष्ण मेद्या पुनः नये मार्गो, नये समाधानों को तलाशती रहती है। सच है, समस्याओं का सागर और ज्ञान के गगनमंडल का इस अखंड लोक में अनंत विस्तार है। इसी कड़ी में वर्तमान परिदृश्य में उभर रही उलझनों और अद्यतन संदर्भो में उत्तरों को रेखांकित करती यह वेब पत्रिका 'ज्ञान-मंजरी' का प्रवेशांक आपके समक्ष प्रस्तुत करते हुए मैं अत्यंत हर्षित हूँ।

हिंदी पटल के आलोक को विस्तार देती, सामान्य जानकारियों को रोचक एवं सुबोधगम्य शैली में गहन विश्लेषण करती परत-दर-परत तहों को खोलती और मसलों के मर्म में पहुँचती, आपको एक ऐसे सफ़र पे ले चलेगी, जहाँ ज्ञान संचित करना, एक रोचक अनुभव प्रदान करेगा। एक प्रश्न मेरे मन में भी था, इसके नाम को लेकर। बहुत मंथन के पश्चात् 'ज्ञान-मंजरी' शब्द दिल को भा गया। और हो भी क्यों न, ज्ञान पर किसी का एकाधिकार तो नहीं, यह तो अनंत स्त्रोतों से आता है और अनंत स्त्रोतों में समा जाता है।यह स्वयं को प्रकट करने के लिए पात्र चुनता है। यह निरंतर संकलन,अभिवयक्ति और संग्रहण से फैलता है और यही 'ज्ञान-मंजरी' की भूमिका का परिचायक है।

इसी सन्दर्भ में मैं श्री इमरान खान जी का हृदय से नमन व आभार प्रकट करना चाहूँगी, जिनके सहयोग व साथ के बिना इस वेब पत्रिका की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। उनके प्रोत्साहन व हौसला अफजाई के बाद ही हमारा ये पहला कदम लक्ष्य की ओर बढ़ पाया है। मैं सदा उनके स्नेह व प्रोत्साहन की आशा करती हूँ। 'ज्ञान-मंजरी' का यह पहला अंक उन बुद्धिजीवियों को समर्पित है, जो ज्ञान सृजन के लिए सदैव जागृत रहते है। पहली प्रति होने के कारण संभव है कि कुछ शेष रह गया हो।हमें आपकी प्रतिक्रियाओं का, आपके बहुमूल्य सुझावों का इंतजार रहेगा जो हमारे राह को आसान बनाएगा। इसी शुभेच्छा के साथ मैं मजरुह सुल्तानपुरी जी की इन पंक्तियों को दोहराना चाहूँगी--

मैं अकेला ही चला था, जानिब-ए-मंजिल मगर ,
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया।

-नसरीन बानों


- संपादक
इस अंक में ...