सम्पादकीय

एक शिक्षिका के रूप में आज मैं जहाँ पदस्थ हूँ, वह छत्तीसगढ़ राज्य का एक छोटा-सा गाँव है। शुरू से ही ‘गाँव’ शब्द से मुझे विशेष प्रेम रहा, कारण हो सकता है कि मुझे कभी गाँव के वातावरण में रहने का मौका नहीं मिला था। गाँवों में भारत की आत्मा बसती है....ऐसा सुन रखा था, सो गाँव के विद्यालय में कार्य करने के अनुभव से ही मन रोमांचित हो उठा था। और जब बात 'धान का कटोरा' कहलाने वाले राज्य की हो तो कहना ही क्या?
आदिवासी बहुल राज्य होने के कारण विद्यार्थियों में इनकी संख्या अधिक होती है। किसी-किसी कक्षाओं में तो पूरे के पूरे बच्चे एक ही वर्ग के हैं। यहाँ के लोग स्वभाव से सरल और भोले हैं,  भोले इतने की आज भी कुछ सामान्य बातों से ऐसे अनभिज्ञ हैं मानों उन बातों की जानकारी होना न होना एक सी बात हो। देश विकास की ओर अग्रसर है और देश में हो रहे विकास को देखा भी जा सकता है, किन्तु एक कड़वा सच यह भी कि ऊपर की तरक्की भीतर से आज भी खोखलापन लिये हुए है। विकास का वास्तविक साक्षात्कार तो मलिन बस्तियों, गाँवों और वनांचलों में जाने पर ही होता है।
मैं आपसे ऐसी दो घटनाओं का जिक्र करना चाहती हूँ जो है तो सामान्य किन्तु मुझे सोचने पर मजबूर कर देती है कि क्या भारत की आत्मा कहे जाने वाले गाँव के नौनिहालों का विकास ऐसे ही होगा या होता रहेगा। पहली घटना तब की है जब मैं क्लास में पढ़ाने के बीच बच्चों से पूछ बैठी- ''क्या आप सिक्ख धर्मावलम्बियों को जानते हैं? क्या आपने उन्हें देखा है?'' जवाब आया- ''नहीं।'' उनका ये जवाब स्वभाविक ही था, क्योंकि ये आवश्यक तो नहीं कि देश की सभी जाति विशेष को हम पहचानें। बच्चों ने मुझसे पूछा- ''वे दिखते कैसे हैं मैडम?'' मैंने कहा- आपने उनकी तस्वीर नहीं देखी क्या?......अरे! हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री भी तो सिक्ख ही थे.....आपने उन्हें टेलीविजन में नहीं देखा क्या?टेलीविजन?.....अभी बिजली की उचित व्यवस्था ही कहाँ है? रेडियो में तस्वीरें नहीं दिखतीं न.....ओह! ....यहाँ एक बात मैं साफ करना चाहूँगी कि मेरा उदेश्य देश की कमियाँ गिनाने का नहीं है और न ही किसी राज्य को पिछड़ा घोषित करने का है, बल्कि विडम्बना तो इस बात की है कि जहाँ आज हम कुछ विद्यालयों में शिक्षण कार्य प्रोजेक्टर के माध्यम से करवा रहे हैं, ठीक वहीँ कुछ किलोमीटर के अंतर में अभी भी रेडियो व तस्वीरों से काम चलाना पड़ रहा है।
दूसरी घटना अभी हाल की है जब कक्षा नवमीं के बच्चों का नामांकन फार्म भरा जा रहा था। फार्म भरते समय जब हमारे सामने एक समस्या आई तो मेरा क्या वहाँ मौजूद सभी लोगों का दिमाग घुम गया और हम सोचने पर विवश हो गए कि यहाँ गलती किसकी है? हुआ यूँ कि कक्षा नवमीं की दो लड़कियाँ जिनके माता-पिता एक ही हैं, किन्तु दोनों के जन्मतिथि में मात्र तेईस दोनों का अंतर पाया गया।.....अरे! ऐसा कैसे? जबकि दोनों बहनें जुड़वाँ भी नहीं थीं। बात की गहराई में जाने से पता चला कि वे दोनों बहनों ने कक्षा आठवीं तक अलग-अलग स्कूलों में शिक्षा ग्रहण की थी। एक ने अपने माता-पिता के साथ रह कर और दूसरी ने अपने नाना-नानी के साथ रह कर पढ़ायी पूरी की। कक्षा पहली में दाखिले के वक़्त, शिक्षक द्वारा जन्मतिथि पूछने पर अभिभावक द्वारा अनुमानित जानकारी से ये सारी गड़बड़ी हुई। जब शिक्षक पूछता है- ''बच्चे की जन्मतिथि क्या है?'' तो अभिभावक की ओर से बड़े ही रोचक उत्तर मिलते हैं, जैसे- “एकर जनम रात मा होइस..... जनम समय बहुते बरखा होत रहिस...अउर इ बड़का बेटवा से ऐ ही कोई पाँच-छः बरस छोट होइस।”.....मतलब बच्चे का जन्म रात के समय हुआ था, उस समय बारिश हो रही थी और ये बच्ची बड़े लड़के से पाँच-छः साल छोटी होगी।..... यानि अनुमानतः बड़ा लड़का बारह वर्ष का है तो बच्ची छः वर्ष की हुई और बारिश हो रही थी तो सम्भवतः महीना जुलाई या अगस्त का ही रहा होगा।....तो लो जी हो गया जन्म का पंजीकरण।
ऐसा नहीं कि जन्म और मृत्यु का पंजीकरण शासन द्वारा नहीं हो रहा है। सारी जानकारियों का लेखा-जोखा रखा जाता है। यहाँ कमी तो बस जागरूकता की है। जन्म व मृत्यु का पंजीकरण करवाना कितना अनिवार्य है, इससे ये लोग अभी भी अनभिज्ञ हैं। यह कहना गलत होगा कि ऐसा सिर्फ इसी राज्य के गाँवों की हालत है, ऐसे उदाहरण देश के हर गाँव में भरे पड़े हैं। अपनी ही धुन में रमे रहने वालों को जागरूकता से क्या दरकार? ये जिम्मेवारी तो वो संभालें जिन्होंने अक्षर ज्ञान लिया हो। 
शाइनिंग इंडिया के बीच जो कसमसाता विशाल भारत है उसे विकसित टेक्नोलोजी का तमगा देकर खुश तो कर दिया गया है, मगर देश की आत्मा पर पड़ी धूल की परतें अब भी ज्यों के त्यों बनी हुई है। दो जून रोटी की चाह रखने वालों का अंतस मन किसी नाद से अब भी झंकृत नहीं होता। आज भी भारत का एक विशाल जनसमूह शाइनिंग इंडिया के परकोटे से बाहर खड़ा है। साधनों के दर्प से दमकता वर्ग आज भी भारत की आत्मा कहे जाने वाले गाँवों को संताप के सिवाय और कुछ देना नहीं चाहता। एक देश में रह कर भी हम सब एक दूसरे के लिए अजूबे बन कर रह गए हैं....चाहे अजूबे हम उनके लिए बन जायें या वो हमारे लिए.........सवाल तो हास्य पूर्ण त्रासदी का ही है।


- संपादक
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