Gyan Manzari
कमल खिलने तो दो !

 मेरे विद्यालय में आज जिस युवक का आगमन हुआ, उसका नाम 'प्रभात कौशिक' है। बातों के दरमयान पता चला कि वर्तमान में मैं जिस विद्यालय में पदस्थ हूँ, वह वहीँ का भूतपूर्व छात्र रह चुका है।आज वह एक सफल अभियंता पद पर कार्यरत है। उससे मिलकर आज सारा विद्यालय गौरवान्वित महसूस कर रहा था। और हो भी क्यों न....छोटे स्तर से पनपी बड़ी उपलब्धियाँ सदैव गर्व की सीमा से परे होती ही हैं।

आप कहीं यह तो नहीं सोच रहे हैं कि हमें इन बातों से क्या सरोकार। तो आप सही भी हैं जनाब! दूसरों की सफलता हमें कब रास आई है, जो अब रास आएगी। किन्तु मेरे लिए यह चकित करने के विषय से कम न था। यहाँ बात सिर्फ सफल होने की नहीं, वरन सरकारी स्कूलों से पढ़ कर सफल होने की है। सरकारी स्कूल..? अरे! यह कोई श्रापित शब्द नहीं है भाई, मगर हाँ किसी संघर्ष से कम भी नहीं। संघर्ष भी ऐसा, जो अपने ही अभावों के परतों से झुनझ रहा है। सफलता की यह, कैसी जद्दोजहद है, कभी उस कीचड़ में खिले कमल से पूछना, जिसने अपने ही बूते पर खिलना सीखा है। कब? किस माली ने उसे संजोया, कब उसकी देखरेख में किसने अपनी नींदें हराम की, कब खाद डाले और कब उसके लगे कीचड़ को साफ़ किया? किन्तु जिसे खिलना है, उसे कब, कौन रोक पाया है। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे उस कमल की भांति ही होते हैं, जो अभाव रूपी कीचड़ में होने के बावजूद भी खिलने का संघर्ष जारी रखते हैं।

       ऐसा कह कर, मैं अपने ही जमात वालों से पंगा नहीं ले सकती। किन्तु इस कटु सत्य से मेरा इंकार कर देना भी वाजिब नहीं। 'कमल' का खिलना प्रकृति की देन है, तो इन बच्चों का भविष्य (खिलना) भी राम भरोसे ही जान लो। ऐसा नहीं इन पुष्पों (बच्चों) की देखरेख के लिए कोई माली नहीं, हैं तो...मगर अपने कर्तव्य के प्रति कितने ईमानदार? यह तो उस माली के हृदय की गवाही ही बयां करेगी। ये पुष्प फलें-फूलें, इसके लिए भी खूब योजनायें बनती, मगर हाय रे! योजनायें ऊपर से नीचे आते-आते इतनी थक जाती हैं कि अपनी साँसें बचा नहीं पातीं और दम तोड़ देती हैं। हृदय आहत तो तब होता है, जब हम यह स्वीकारने लगते हैं कि यहाँ हर बच्चा 'प्रभात कौशिक' नहीं हो सकता या बन सकता। खिलने की चाहत भला किसकी न होगी? ऐसा कौन होगा जो मुरझाने की नियत रखता हो।

     इस बार जब आप 'बालदिवस' मनाने की तैयारी करें, तो मेरा आप सभी से एक अनुरोध है कि अपनी इस तैयारी में ,अपने कर्तव्य के प्रति थोड़ी ईमानदारी को भी शामिल कर लें। मुझे नहीं लगता कि इस अवसर पर अपने नौनिहालों को इससे अच्छा कोई और तोहफा होगा। पहल तो करें, फिर देखें एक क्या,  कई “प्रभात” सम्पूर्ण विश्व को प्रज्वलित करेगें।

कीचड़ में ही सही, खिलने तो दो ।
 बड़े मौके न सही एक मौका तो दो।


- संपादक
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