सम्पादकीय

मीडिया का ज्यादा ध्यान वैज्ञानिकों के काम पर तब जाता है, जब उन्हें पश्चिम में बड़े सम्मान या पुरस्कार मिलने लगते हैं। ये तरीका गलत है, बल्कि होना ये चाहिए कि हम अपने यहाँ काम कर रहे वैज्ञानिकों, उनके काम को जाने और उनके बारे में लोगों को बताएँ। ― डॉ. चन्द्रशेखर वेंकटरामन

उक्त कथन कहने वाले विश्वविख्यात वैज्ञानिक का भारत भूमि पर जन्म लेना ही भारतीय विज्ञान इतिहास को गौरवान्वित करता है। चलिए आज हम इनका पदान्वय करते हैं। विराट समुद्र की नील-वर्णीय आभा व आकाश का नीलापन असंख्य लोग को आदिकाल से चकित करते रहे हैं। जिज्ञासु मन सदैव से ही प्राकृतिक सौन्दर्य का प्रश्नकर्ता रहा है और अपनी काल्पनिक उपागमों से संतुष्ट भी होता रहा है, मगर इस आभा पर पड़े रहस्य के परदे को वैज्ञानिकता की धरातल पर लाने का सफल प्रयास महान वैज्ञानिक “डॉ.चंद्रशेखर वेंकटरमन” ने किया। आइये इस महान वैज्ञानिक के बारे में कुछ जाने। डॉ.चंद्रशेखर वेंकटरमन का जन्म 7 नवम्बर 1888 को तमिलनाडु राज्य के चिरुचिरापल्ली गाँव में हुआ था। रामन बचपन से ही विज्ञान में रूचि रखते थे। उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज मद्रास में शिक्षा पाई थी। भौतिक विज्ञान में उन्होंने एम.एस.सी. की डिग्री विश्वविद्यालय में सबसे ज्यादा अंक लेकर प्राप्त की। उनका पहला शोधपत्र उनके कॉलेज के जमाने में ही “फिलासाफिकल मैगजीन” में प्रकाशित हुआ था और उनकी प्रतिभा से वे भारत सरकार के वित्त-विभाग में डिप्टी अकाउंटेंट जनरल के पद पर कोलकाता में नियुक्त हुए। तब यह पद अंग्रेजों को ही मिलता था, किन्तु रमन के युवा मन ने अपने विज्ञान प्रेम पर इन ऊँचे पदों को बलिदान कर दिया और वे कोलकाता के साइंस कॉलेज में भौतिकी के प्रोफेसर बन गए। वहीँ उन्होंने प्रकाश संबंधी खोज की और नोबेल पुरस्कार से सम्मानित हुए।

“रमन प्रभाव” की खोज 28 फरवरी को हुई थी। इस महान खोज की याद में 28 फरवरी का दिन हम 'राष्ट्रीय विज्ञान दिवस' के रूप में मानते हैं। रमन ने यह सिद्ध कर दिया था कि सस्ते उपकरण व आर्थिक समस्याएँ कभी भी प्रतिभा के आड़े नहीं आ सकती। उन्होंने सिद्ध किया कि ब्रिटिश द्वारा शासित और पिछड़ा भारत भी आधुनिक विज्ञान के क्षेत्र में अपना मौलिक योगदान दे सकता है। यह खोज केवल भारत के वैज्ञानिक इतिहास में ही नहीं बल्कि विज्ञान की प्रगति के लिए भी मील का पत्थर प्रमाणित हुई। उन्हें भारतरत्न का सर्वोच्च सम्मान सन 1945 में मिला। डॉ.रमन ने बैंगलोर में 'रमन रिसर्च संसथान' की स्थापना की। इस महान वैज्ञानिक का 82 वर्ष की उम्र में सन 1970 में निधन हो गया। डॉ.रमन भारत में वैज्ञानिक दृष्टि एवं चिन्तन के विकास के प्रति समर्पित थे और यही समर्पण वे भावी विज्ञान जिज्ञासुओं में देखना चाहते थे।

वर्तमान में विज्ञान जिन ऊंचाइयों को छू चुका है, उन ऊंचाइयों में मानव मस्तिष्क का कोई सानी नहीं। विज्ञान अपनी उपलब्धियों का लोहा मनवा चुका है और आगे भी मानव अपनी बुद्धि के विशालतम रूप का परिचय देता रहेगा। 'राष्ट्रीय विज्ञान दिवस' हमें एक अवसर प्रदान करता है कि हम विज्ञान के सरलतम रूप व विज्ञान में रूचि रखने वाली प्रतिभाओं को सामने ला सकें। सही मायने में इस दिवस की सफलता तब होगी जब भारत का अभाव ग्रस्त बच्चा भी विज्ञान की समझ को जाने व परखने को ललाइत हो। मन की जिज्ञासाएँ उड़ान भरें, क्या, क्यों और कैसे वाले सवालों के बौछार हों और फिर प्रमाणिकता के धरातल पर संतुष्टि भी मिले......

इसी शुभेच्छा के साथ आप सभी पाठकगण को 'ज्ञान मंजरी' की समस्त टीम की ओर से 'राष्ट्रीय विज्ञान दिवस' की शुभकामनाएँ...


- संपादक
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