Gyan Manzari
सम्पादकीय

प्रिय पाठकों,

आपके हृदयस्पर्शी उदगार सुझाव और समीक्षाओं के साथ 'ज्ञानमंजरी' ने एक वर्ष की परिक्रमा पूरी कर ली। 'ज्ञानमंजरी' का यात्रा-वृतांत वैसा ही रहा, जैसे किसी मार्ग पर चलते पथिक का जीवन अनुभव हो....आरोह और अवरोहों से भरा हुआ। पूर्णतः ज्ञान-विज्ञान पर आधारित होने के बावजूद, हमने इसमें साहित्य की भीनी छीटों से कभी-भी परहेज नहीं किया, ताकि आपकी मंजरी मात्र शुष्क ज्ञान की अभिव्यक्ति का परिचायक बनकर न रह जाए बल्कि रागात्मक संबंधों की चरम पराकाष्ठा की प्रमेय निष्पत्ति का आभास भी बना रहे, जिससे हम सबको ज्ञान रूपी आनन्द की अनुभूति होती रहे। पत्रिका की सफलता बहुतेरे इसी समागम का नतीजा है।

 

इसकी शुरुआत क्योंकर और कैसे हुई यह रहस्य के आवरण में लिपटा रहे तो श्रेयस्कर होगा, किन्तु इसे वेब-पटल पर लाने के पीछे का उद्देश्य सदैव से ही ज्ञानार्जन रहा और रहेगा। जब हमने इसके पहले अंक को निकाला था, तो उस वक़्त यह सोचा भी नहीं था कि हमारे इस छोटे से प्रयास को आप सभी का इतना स्नेह और सहयोग मिलेगा। ऐसा नहीं है कि हमने समाज की मानवीय कमजोरियों, मानसिक स्खलन और लाक्षणिक शब्दों के बाण न झेले हों, मगर इससे हमें और भी हौसला मिला, साथ ही इसमें आपका हौले से हमें आगे बढ़ाने की रजामंदी भी दिखी।

वैसे अब तक आप पाठकगणों ने हमारा प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से बहुत सहयोग दिया और आगे भी हमें, आपके कीमती सुझावों व दिशा-निर्देशों की आवश्यकता बनी रहेगी। यह पत्रिका पूर्णरूप से आपकी है, आगे के अंकों में आप अपनी इस पत्रिका में क्या पढ़ना चाहेंगे, इससे हमें अवश्य अवगत कराएँ, ताकि अपनत्व व ज्ञानार्जन की रोचकता बनी रहे।

अंत में, मैं अपने 'ज्ञानमंजरी'की पूरी टीम को बधाई देना चाहती हूँ, जिन्होंने पत्रिका के हर अंक में आने वाले उतार-चढ़ाव में अपना संयम बनाए रखा। मैं कृतज्ञ हूँ, उन नए रचनाकारों, संकलनकर्त्ताओं और स्थायी-स्तंभ लेखकों की, जिन्होंने अपने व्यस्ततम् समय में से कुछ क्षण निकालकर 'ज्ञानमंजरी' को समर्पित किया। और इस दरमियान अगर मैं श्री इमरान खान जी (पत्रिका के निर्देशक) का जिक्र न करूँ तो पत्रिका की सफलता का बखान करना व्यर्थ है। उन्होंने हमेशा  पूरी टीम को साथ रहकर काम करने के लिए प्रोत्साहित किया। उनका हम सबको उत्साहित करना ही हमें ऊर्जावान बनाए रखता है।

पिछले एक वर्ष के अनुभव ने हमें इतना तो जरुर सिखाया कि जिसने आगे बढ़ने का ठाना हो उसे किसी न किसी का साथ मिल ही जाता है, बस इरादे नेक और सार्वभौमिक हितकारी होनें चाहिए। इस अवसर पर यूँ ही चंद पंक्तियाँ कहने को बाध्य हो रही हूँ, जिसमें आप सभी के समर्थन की आस भी छिपी हुई है....

“इस प्रणय गर्भ की भूमि से,
प्रेमांकुर किसलय फूटेगा।
आबद्ध करो खुद को,
कैसा भी, कितना भी,
इस अप्रतिम सौन्दर्य के कारण
सुमनों का डंठल टूटेगा।।"


- संपादक
इस अंक में ...