पूजा के बाद

पूजा के बाद हमसे कहा गया

हम विसर्जित कर दें

जलते हुए दीयों को नदी के जल में

ऐसा ही किया हम सबने।

सैकड़ों दीये बहते हुए जा रहे थे एक साथ

अलग-अलग कतार में।

वे आगे बढ़ रहे थे

जैसे रात्रि के मुंह को थोड़ा-थोड़ा खोल रहे हों, प्रकाश से

इस तरह से मीलों की यात्रा तय की होगी इन्होंने

प्रत्येक किनारे को थोड़ी-थोड़ी रोशनी दी होगी

बुझने से पहले।

इनके प्रस्थान के साथ-साथ

हम सबने आंखें मूंद ली थी

और इन सारे दीयों की रोशनी को

एक प्रकाश पुंज की तरह महसूस किया था

हमने अपने भीतर।


लेखक परिचय :
डॉ. नरेश अग्रवाल
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