नामोनिशान

रात के गहन निविड़ में,
बेचैनी के वशीभूत,
अचानक,
श्मशान की एक कब्र के पास जाकर,
कुछ बुदबुदाता हूँ ,
उसे सहलाता हूँ ,

पास रखी हुई कुदाल,
उठता हूँ ,
खोदना शुरू करता हूँ ,
भुरभूरी मिट्टी,
खुद जाती है जल्दी ही,

पर,
नहीं मिलता मेरा सशक्त मन,
दफ़न कर दिया गया था उसे,
तानाशाहों ने बन्दुक के दम पर,
निठारी के नौनिहालों की तरह,
बलात्कार और हत्या के बाद,

नहीं मिलती खोपड़ी, हड्डियाँ,
ज्वलंत सिद्धांतो की,
विचार-नसों और आतों,
के लम्बे रेशे,
जो मजबूत थे तांबे के मोटे तारों से,
जाने गल गए कैसे,
षड्यंत्र है प्रशासकों का,

अवश्य डाला है कोई,
तेज़ाब से भी भयानक,
रसायन,
षड्यंत्र से वशीभूत होकर।

ताकि नामोनिशान ही मिट जाए,
सदा के लिए।
ताकि अंत हो जाए,
एक युग का,
सदा के लिए।


लेखक परिचय :
अजय कुमार तिवारी
फो.नं. -
ई-मेल - aktiwary73@yahoo.in
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