मैं अजन्मा

मैं अजन्मा,
निर्बोध बालक,
कोख में व्याकुल
तड़प रहा हूँ।
मैंने की नही जो गलती,
उसकी सज़ा
भुगत रहा हूँ।
माएँ जो
अपने अजन्मे को
कोख में ही
वीरता के पाठ पढ़ती हैं।
कभी राम की
कभी रहीम की
कथा सुनती हैं।
अर्जुन अपने, 
अजन्मे का
चक्रव्यूह से पार की रचना 
बता चुके थे।
कथांत से पहले,
माँ का सो जाना
अभिमन्यु का काल बना।
किन्तु
पिता मेरे ने
जो कथा माँ को सुनाई है,
माँ की क्या,
मेरी भी नींद उड़ आई है।
हे जनक! तू ने
यह क्या कर डाला।
सातवाँ छोडो,
पहला ही बंद कर डाला।
अच्छा कल
अच्छा भविष्य
अच्छे संस्कार ,क्या दोगे?

जब अपने दूषित कतरे को,
मुझमें दे डाला।
कैसे पार मैं जाऊँगा,
कैसे तोड़ मैं पाऊँगा,
वो,चक्रव्यूह का द्वार,
जो,
मेरे ही जनक ने रच डाला।
मैं अजन्मा,
निर्बोध बालक,
डरता हूँ,
बाहर आने से।
जो गलती मैंने की नहीं,
उसकी सजा,
भुगत रहा हूँ।
तड़प रहा हूँ।
सहम रहा हूँ।


लेखक परिचय :
संपादक
फो.नं. --
ई-मेल - idea.nasreen06@gmail.com
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