शिक्षा का महत्त्व -आज के सन्दर्भ में

शिक्षा आज जीवन की अनिवार्य आवश्यकता बन गई है.परिवर्तन शील परिस्थितियों में शिक्षा ही जीवन की आधारशिला बन उसकी दशा दिशा निर्धारित करती है. ज्ञान के आभाव में मनुष्य विवेकहीन हो जाता है. और जहाँ विवेक नहीं होता वहां ममता,करुणा,दया ,मानवीयता जैसे गुण पनप ही नहीं पाते. हमारे देश में शिक्षा की स्थिति आज भी बेहतर नहीं है. ...आजादी के बासठ वर्षोंके बाद भी आज वही परिस्थितियां हैं जिनसे हमें संघर्ष करना पड़ा था. ..विशेष रूप से महिलाओं की शिक्षा की स्थिति अत्यंत दयनीय है. देश के ७०प्रतिशत क्षेत्रों में आज भी लड़कियों को उतनी ही शिक्षा दी जाती है क़ि वे पत्र व्यवहार कर सकें या थोडा काम चलाऊ ज्ञान मिल सके. उनकी आगे की शिक्षा के लिए गांवों में स्कूल नहीं हैं, ..दूर दराज के क्षेत्रों में तो यदि एक प्राइमरी स्कूल खुल भी गया तो वहां लड़कियों की उपस्थिति नगण्य ही होती है. ..सरकारी स्कूलों में तो शिक्षा केवल हास्यास्पद स्थितियां उत्पन्न करती हैं, .मेहनत करने वाले बच्चों के लिए खोले स्कूलों में जो भोजन व्यवस्था की गई वह भी उपेक्षा का शिकार बनती जा रही है. यदि उन मजदूर बच्चों को भी उचित शिक्षा मिलती तो वे भी उच्च पदों तक पहुँच पाते. डाक्टर,इंजीनियरया प्रशासनिक  पदों को सुशोभित कर पाते. ..वस्तुतः शिक्षा के अभाव में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले हों या निम्न ,मध्य वर्ग के लोग हों --वे अनेक अनैतिक ,अपराधों ,आतंक ,हिंसा,नशा जैसे गलत कामों में लिप्त हो जाते हैं. विवेकशून्य अशिक्षित जीवन उन्हें अपराध की दुनियां में ले जाता है. आये दिन समाचार पत्रों में बच्चों की आत्महत्याओं की ख़बरें प्रकाशित होती हैं .कुछ दिन चर्चा होतीहै, फिर सब कुछ शांत हो जाता है. वह शिक्षा जो युवाओं को आत्महत्या जैसे कदम उठाने को विवश करे क्या वह व्यावहारिक शिक्षा है?..हम उन पर जो उम्मीदें लाद देते हैं... अपने सपनो को अपने बच्चों के माध्यम से पूरा करने के लिए  ..वे सपने कभी साकार हो पाएंगे या हमारे बच्चे उनसे कैसी कैसी मानसिक प्रतार्नाओं  से गुजरते होंगे ..क्या कभी सोचा है? वे भी सपने देखते है, उन्हें सच करना चाहते हैं पर माता-पिता के सपने उन्हें मजबूर करते हैं अपने सपनो को दफ़न करने के लिए ..और जब असफलता हाथ लगती है तो जीवन का अंत ही होता है. मेरा यह मानना है की शिक्षा रोजगार परक भी हो, और नैतिक भी -जो उन्हें आत्मविश्वासी बना सके, असफलताओं से हारना नहीं ,परिस्थितियों से लड़ना सिखा सके. शिक्षा के क्षेत्र सीमित न हों ,अनेक विकल्प हों ..संभावनाओं के नए क्षितिज खुलें ताकि बच्चे उनमे अपने सपनों को भी साकार होता हुआ देख सकें. ..क्योंकि शिक्षा केवल भौतिक विकास ही नहीं करती बल्कि वह व्यक्ति का नैतिक, मानसिक और आत्मिक विकास भी करती है. युवाओं को सुसंस्कृत बनाने की जरुरत है, जिनसे मानवता ,करुणा, विश्वास, निष्ठां ,जैसे गुणों का विकास हो सके. संस्कृत में कहा गया है --''साहित्य संगीत कला विहीनः ,साक्षात् पशु पुच्छ विषाण हीनः ''पशुवत जीवन की कल्पना भी भयानक होती है. केवल शिक्षा ही व्यक्ति का सर्वांगीण विकास कर सकती है. वस्तुतः शिक्षा का अर्थ ही भ्रामक बना दिया है हमने. शिक्षा आज अर्थ का पर्याय बन गई है, केवल अर्थोपार्जन हेतु ग्रहण की गयी शिक्षा कभी नैतिक मूल्यों, आदर्शों, जीवन और समाज की प्रगति या आत्मिक उत्थान की बात नहीं करती. उसी प्रकार आज शिक्षक स्वयम दीन हीन,अपने संघर्षों और जीवन यापन की जद्दोजहद से जूझ रहे हैं, उनके आत्मबल और मनोबल को बढ़ती हुई भौतिकता और आधुनिकता से भी लड़ना पड़ रहा है. छात्र भी आज अपने अधिकारों और हक़ की लड़ाई में राजनीति के दांव पेंच सीख रहे हैं अतः शिक्षकों का आदर ,सम्मान, जीवन मूल्यों की बात बेमानी हो गयी है. आज, दोनों के समबन्धों में दूरियां आ रही है, आज एकलव्य, राम,कर्ण, जैसे शिष्यों की कमी नहीं है, न ही द्रोण, भीष्म,परशुराम, अब्दुल कलाम, डॉ,राधाकृष्णन ,जाकिर हुसैन जैसे गुरुओं की, पर हमारी सोच में बदलाव आया है, वह सही दिशा में हो, और समाज के अन-हितकारी  न हो यह हम शिक्षकों का पुनीत कर्तव्य है. हम जरुर सफल होंगे, मेरा विश्वास है. -परन्तु शिक्षक जब स्वयं भूखा रहेगा और  व्यवस्था के प्रति विद्रोह ,प्रदर्शन के लिए विवश होगा तो वह कैसी शिक्षा दे पायेगा युवाओं को?भूखे पेट तो भजन भी  नहीं होता -''भूखे भजन न होहिं गोपाला '' जब हम परिस्थितयों को अपने श्रम एवं प्रयासों से अनुकूल बनायेंगे तभी कुछ सुधार संभव है. इसमें सरकार व् समाज दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण है. 
आज शिक्षा उतनी ही जायज है,जो दो जून की रोटी उपलब्ध करा सके, वह शिक्षा क्या दे रही है, क्या परोस रही है इससे शायद ही कोई चिंतित होगा.भौतिकतावादी युग में जल्दी से जल्दी अधिक से अधिक धन कमाने की लालसा शिक्षित कहे जाने वाले वर्ग की सोच को भी दूषित बना रही है. आज युवा बड़ी बड़ी डिग्रियां तो प्राप्त कर लेते हैं पर उनमे नैतिक और मानवीय आदर्शो का विकास नहीं हो पाता.बहुत दुःख होता है जब हम समाचारों में पढ़ते है --''एक पुत्र ने माँ का गला काट डाला...सगे पुत्र द्वारा पिता की निर्मम हत्या ....'',ऐसे समाचार हमें व्यथित करते हैं ,पीड़ा पहुंचाते हैं, इस लेख को लिखने का मेरा उद्देश्य भी यही है, ..वास्तव में शिक्षित  होना एक पूर्ण सुसंस्कृत व्यक्तित्व का निर्माण करना है. ---

विद्या ददाति विनयम,
विनयाद यति पात्रताम
पात्रत्वाद धनमाप्नोती,
धनात धर्म ,ततः सुखं 

विद्या विनय देती है ,जिससे योग्यता आती है, योग्यता से धन ,और धन से धर्म सिद्ध होता है ,जहाँ धर्म;[कर्तव्य,निष्ठां करूणा,दया]  है वहां सुख़ ही सुख़ है ''
अतः आज शिक्षा का हमारे जीवन में बहुत महत्त्व है. पर वह शिक्षा जो स्वार्थी  नहीं,सम्पूर्ण मनुष्य का निर्माण कर सके वही सफल है 


लेखक परिचय :
श्रीमती पद्मा मिश्रा
फो.नं. ---
ई-मेल - --
इस अंक में ...