प्रीति अज्ञात के फोटो

शाम की अपनी कहानी है....सारे दिन की व्यस्तता और मन की बेवजह उड़ान एक अनचाही-सी थकान पैदा कर देती है. हृदय की धड़कन, अभी सुस्त है, पर रुकी नहीं. लेकिन फिर भी मन निढाल-सा, मायूस हो ठहर जाता है कहीं ! ये कैसा इंतज़ार है, जो थमता ही नहीं ! हर उदास शाम, यूँ ही बैठ जाना और सुबह होते ही, अचानक पंख फड़फड़ा दुगुनी तेज़ी से उड़ जाना ! न जाने, रोज ही ये हिम्मत कैसे टूटती है और रोज ही इतना हौसला कहाँ से पैदा होता है. खैर, जो भी है ; ज़रूरी है, इसका होना भी ! चलते रहना ही तो जीवन है और जब तक जीवन है, चलो....कुछ क़दम यूँ भी सही ! जब बारिश की बूँदें, पत्तों से सरकते हुए हौले से माटी को स्पर्श करती हैं, तो 'टिप-टिप'...जब आसमान के घने बादल दिन-रात अठखेलियाँ करते हुए बरसते हैं, तो 'रिम-झिम'...जब यही पारदर्शी मोती टीन या किसी भी ठोस सतह से टकराकर गुनगुनाता हुआ गीत सुनाने लगता है, तो 'छन-छन' और जब ये एक शरारती बच्चे-सा बन पत्ते से हटने का नाम ही न ले, तो हम जैसे लोग उसके इस बिछौने को एक प्यारी-सी थपकी दे, उछाल दिया करते हैं और तभी ये घबराकर 'धम्म' से गिर पड़ता है ! * अपनी ही प्रतिक्रिया का एक अंश साझा किया है !


लेखक परिचय :
प्रीति "अज्ञात"
फो.नं. ---
ई-मेल - preetiagyaat@gmail.com
इस अंक में ...