खुले आसमां में सोये थे कुछ शक्स इस तरह से

खुले आसमां में सोये थे कुछ शक्स इस तरह से ;

लिपट कर रो रहा हो बच्चा मां के आँचल में जिस तरह से

अध् नग्न था हर शक्स न लिबास था बदन पे,

बे हिसाब - बे सबब कहर जड़ों कि रात उन पे,

कहिं तो लाट कि चद्दर मखमल के बिस्तर हैं ;

किसी के बाप नेता हैं , तो मामा भी मिनिस्टर हैं ,

कहिं भूख़ बेबसी से कुछ लोग मर रहे हैं ;

कहिं गोदामों में भी बेहिसाब पैसे भी सड़ रहे हैं ,

कहिं मुरीद हो न जाना तुम जमाने के शान-वो-शौकत का ;

कि नाटक कर रही है दुनिया अश्लियत में इस तरह से ,

लिपट कर रो रहा हो बच्चा मां के आँचल में जिस तरह से ;

लिपट कर रो................................................................


लेखक परिचय :
विशाल वर्मा लखनवी
फो.नं. -7836898542
ई-मेल - ccivishdem@gmail.com
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