आंसुओं को मिलते हमने देखा है

हवा के झोकों में आशियानों को उड़ते हमने  देखा है ,
बरसाती बारिश में आंसुओं को मिलते हमने  देखा है ,
सिमट कर सिसक कर , किसी अंधेरे गलियारे में ,
हर गरीब बच्चे के बचपन को , खोते हमने देखा है ,
नहीं निकलता धूप में कोई , कि चर्म काला न पड़ जाए ,
चिलचिलाती धूप में , कई बच्चों को नंगे-पांव चलते हमने देखा है ,
हवा के झोंकों में ................................................... ।।
न स्कूल , न पुस्तक , न गुरु के ज्ञान की चाहत ,
कई मासूम बच्चों को मांगते भीख , हमने देखा है ,
बहुत मजबूर हैं वो बच्चे जो रो कर भूखे सोते हैं ,
बहुत आलीशान होता है , उनके साहिब का बंगला ,
जिनके घरों में , ये बच्चे मजदूर होते हैं ,
बहुत लंबी गाड़ी है , वातानुकूलित भी ,
कई बच्चों को शीशे पर रख कर हाथ चलते हमने देखा है,
हवा के झोंकों में................................................. ।।
नहीं देता है है ध्यान , कोई उस नन्ही सी जान पर ,
सरकारी अस्पतालों की गलियों में , जो सिमट कर सोया होता है ,
बहुत बीमार है वो बच्चा , माँ भी खूब रोती है ,
पर वो मुस्कुराकर , माँ के आँचल में दम तोड़ देता है ,
मुझे मालूम है , वो बहुत खुदगर्ज होता है ,
नहीं तो जिंदगी की भीख मांगते बहुतों को देखा है ,
खत्म नही होती कहानी , उसकी मौत पर भी मानते जश्न अमीरों को हमने देखा है ,
हवा के झोंकों में ..................................................      ।।


लेखक परिचय :
विशाल वर्मा लखनवी
फो.नं. -7836898542
ई-मेल - ccivishdem@gmail.com
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