भिखारी की पूँजी: रिपोर्ताज

भिखारी की पूँजी

श............ आज तो बहुत ठंड है! हाथ मलता हुआ मैं बैग लटकाये सुबह-सुबह तैयार होकर कॉलेज के लिए निकला तभी अचानक मेरी नज़र एक बूढ़े आदमी पर गयी-बिल्कुल गंदा, फटे हुये कपड़े पहने, पर चेहरे पर रौनक और चमक ऐसी मानो सुबह की सारी ताज़गी उसके चित में पैठ कर गयी हों। मैं आगे बढ़ा और वह भी मेरे पीछे-पीछे बढ़ता गया मेरा पूरा ध्यान उसी पर खिच गया। वह पता नही किन ख्यालों में खोया हुआ था। जब मैं बस स्टेशन के पास पहुंचा और थोड़ी देर पीछे देखा तो वह बूढ़ा आदमी जो मेरे पीछे था वह अब स्टेशन के गेट के बाहर फटी हुयी चद्दर( कथोला ) को जमीन पर बिछाकर बैठ गया और उसके चेहरे की सारी रौनक, मन की सारी चंचलता और खुशी अचानक दुख और वेदना से भर गयी। अब उसका चेहरा पूरी तरह उदास, नीरस, सांसारिक वेदनाओ और प्रताड़नाओ से भरा हुआ प्रतीत होने लगा। उसके प्रति मेरी उत्सुकता अचानक तीव्र हो गयी और और मेरे मन में न जाने क्यूँ एक अजीब सी सरसराहट और गुदगुदी होने लगी। एक तरफ मेरे कॉलेज जाने का समय हो गया था और दूसरी तरफ यह अचरज में डालने वाला दृश्य! इसी बीच बूढ़े ने इधर-उधर देखा और धीरे से अपने जेब से चिल्लर( छुट्टे रुपये ) निकाल कर चद्दर पर बिखेर कर आँखों में आँसू भरकर एकंघा होकर लेट गया और हे बाबू ! हे भईया ! की वेदना पूर्ण आवाज से आते-जाते लोगों को आवाज लगाने लगा..........................।

मैं पूरी तरह सोच में डूब गया कि इस भिखारी द्वारा चद्दर पर स्वयं के डाले गए रुपये की प्रसांगिकता आखिर क्या है? क्या भिखारी अपने रुपयों का प्रदर्शन कर लोगों की सहानुभूति को प्राप्त कर रहा था? या एक व्यवसाय को अपने व्यक्तिगत स्तर पर चलने का प्रयत्न कर रहा था ........................?

वाणिज्य का छात्र होने के नाते मेरा पूरा ध्यान उसकी इस व्यापार शैली और अद्भुत कौशल की ओर पूरी तरह लचक गया था। व्यापार में कहीं पढ़ा था कि व्यापार को चलाने के लिए पूँजी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है पर इसका अनुभव वास्तविक रूप से आज हुआ।

जब मैं ये सब देख चुका तब भिखारी के पास जाकर पूछा, “दादा जी, आपने स्वयं के रुपयों को इस चद्दर पर क्यूँ फेका?” भिखारी थोड़ी देर तक मेरी तरफ घूर कर देख्नने लगा, मैं थोड़ा सहम गया पर पुनः पूछने पर उसने उत्तर दिया – “आज के कलयुग में बिना कुछ लगाए कुछ नही मिलता बच्चा तू नादान है अगर मैं इस चद्दर पर रुपये न फेकता तो शायद लोग मुझे भीख नही देते और आखिर भीख की आदायगी तो करनी ही पड़ेगी न।“

मैं भिखारी की बातें सुन कर चौक गया और थोड़ी देर वहीं खड़ा हुआ सोचता रहा कि क्या भीख मांगने के लिए भी आज के इस वर्तमान युग में पूँजी की जरूरत है? आखिर ये विचार भिखारियों को दिया किसने? क्या वास्तव में आज भीख मांगना भी व्यवसाय के दायरे में आ गया है ....................?????


लेखक परिचय :
विशाल वर्मा लखनवी
फो.नं. -7836898542
ई-मेल - ccivishdem@gmail.com
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