प्रेरक विचार दिसम्बर 2014

ढृढ़ता
प्यासे, निर्जन रेगिस्तान में भी पानी तलाशते हैं और मरते हुये सैनिक अंत काल  में  भी हथियार ही ढूंढते हैं;  इच्छाओं की ढृढ़ता ही हमसे कोई बड़ा कार्य करवा पाती है। 


व्यवसायी
जो व्यवसायी स्वयं अपने एवं लोगों के श्रम, पूंजी, भवन, मशीनों, भण्डार, आदि की गति एवं स्थिति के एक-एक पल का हिसाब रखते हैं, वे ही सही उद्यमी होते हैं।


रास्ते
सभी कार्यों को सम्पन्न करने के लिये रास्ते हैं एवं उपाय भी। जो उन्हें जानता है वह उसमें लग जाता है, दूसरे चुपचाप बैठे रहते हैं।


चुपचाप
चुपचाप वे लोग बैठे हैं, जिनमें सक्रियता के बीज का अभी तक आरोपण नहीं हुआ है। गतिशील हैं वे लोग जिन्होंने सृजन करना अब आरम्भ कर दिया है। 


समय
समय उन्हें हाथ का सहारा देकर गति देता है, जिनमें उसके साथ चलने की उर्जा और शक्ति होती है। समय उनका साथ छोड़ देता है जो अभी उसके साथ चलने में अयोग्य है।


कोशिश
हम कोशिश करके थक जाते हैं, इसलिये अयोग्य है, हम कोशिश करके जीत जाते हैं इसलिये योग्य हैं।


दायित्व
जब पारिवारिक दायित्व अधिक होता है, काम के प्रति रूचि बढ़ जाती है। जब दायित्व का अभाव कम होता है, अनावश्यक कामों में उनकी रूचि अधिक बढ़ जाती है।


मन
खुश मन में लोगों को देने की शक्ति होती है, दुखी मन में लोगों को रूलाने की।


काम
काम हमेशा त्वरित गति चाहते हैं, शिथिलता नहीं। जहाँ शिथिलता है वहाँ काम का कोई अस्तित्व ही नहीं।


आग
जलती हुई आग को बुझाया जा सकता है लेकिन सृजन की आग को नहीं।
 

 


लेखक परिचय :
डॉ. नरेश अग्रवाल
फो.नं. -+91 9334825981
ई-मेल - smcjsr77@gmail.com
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