इस तरह नज़दीकियों का सिलसिला अच्छा नहीं

इस तरह नज़दीकियों का सिलसिला अच्छा नहीं
रोज़ का मिलना-मिलाना बाख़ुदा अच्छा नहीं

मसअले जो हैं हमारे बैठ के सुलझाएँ हम
दो दिलों के बीच इतना फ़ासला अच्छा नहीं

ज़ात-मज़हब कुछ नहीं है, बाँटने का काम है
जो मनुज को बाँट डाले वो ख़ुदा अच्छा नहीं

तू समझता है मुझे औ’ मैं समझता हूँ तुझे
फिर हमारे बीच कोई तीसरा अच्छा नहीं

सौ खताएँ माफ़ तेरी, हर कमी है ख़ासियत
प्यार सच्चा हो अगर तो कुछ बुरा-अच्छा नहीं

मुख़्तसर-सी बात है ये जान पाओ, जान लो
दिल दुखाकर जो मिले वो फ़ायदा अच्छा नहीं

भीड़ से हटकर अगर कुछ कर सके तो सोच ले
भीड़ का हिस्सा न हो ये फ़ैसला अच्छा नहीं

हौसला हो पार जाने का तो दरिया में उतर
ख़्वाब आँखों को दिखाकर फिर दगा अच्छा नहीं

बेचना ईमान को अनमोल दौलत के लिये
कौन समझाये तुझे ये रास्ता अच्छा नहीं


लेखक परिचय :
के. पी. अनमोल
फो.नं. -08006623499
ई-मेल - kpanmol.rke15@gmail.com
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