जिन्दगी

जिन्दगी, 

ना तूने मुझे एक पल जीने दिया
ना चैन से मरने दिया,
तूने तो खूब खेल खेला मेरे साथ
पर मुझे एक बार भी ,
खेल कर
हराने तक का भी मौका ना दिया।
जब भी लगा की
तू संभल गयी है,
एक
भूचाल- सा ले आती थी,
फिर तिनके भर सहारा बनकर
तू ही मुझे बचाती थी ।
कभी लगता था मैं जीत गयी तुझसे,
कभी तू हारती थी,
आँख मिचौली
बचपन से अबतक रोज़ -रोज़ खेलवाया था।
फिर भी
आज तक तूने मेरा साथ दिया है,
कभी अन्धेरों में
तो कभी उजालों में
अपना हाथ दिया है।
समझ नही आता
कि जो जिन्दगी
कभी- कभी एक भार सी लगती है,
फिर ना जाने
अचानक
कैसे वह एक उपहार सी लगती है।
तेरे इसी अंदाज को
कोई समझ नहीं पाया है,
पता नहीं
क्या नाम दूँ तुझे,
अपना दोस्त कहूँ
या
दुश्मन करार दूँ तुझे।


लेखक परिचय :
मनीषा पराशर
फो.नं. ---
ई-मेल - -maniparashar21@gmail.com
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