अनुशासन की आवश्यकता

संविधान ने जहाँ एक ओर हमें स्वतंत्रता प्रदान की है तो दूसरी ओर हमें कर्तव्यों के पालन के लिए प्रतिबद्ध किया है। स्वतंत्रता यदि सीमा से अधिक है, मर्यादाओं को लांघ रही है तो वह उच्श्रृंखलता का रूप ले लेगी। 
जीवन का कोई भी क्षेत्र चाहे वह सार्वजनिक हो या निजी, घर, परिवार , समाज सभी जगह अनुशासन की आवश्यकता होती है। विद्यालय तो अनुशासन की पाठशाला ही है। जहाँ हर कदम पर अनुशासन की शिक्षा दी जाती है। अनुशासित बच्चे ही देश का मान बढाते हैं। एक अध्यापक होने के नाते हम स्वयं को कर्तव्यों से विमुक्त नहीं रख सकते। प्रार्थनास्थलीय कार्यक्रम से लेकर अंतिम कालांश अध्ययन तक हमें अपने कर्तव्यों की पूर्ति के लिए तत्पर रहना होता है। समय प्रबंधन भी इसमें अहम् भूमिका निर्वाह करता है। पूर्णरूप से समर्पित शिक्षक ही विद्यालय में बालकों के व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास कर सकता है तथा  सृजनशीलता से शिक्षा के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित कर सकता है। 
वर्ड्सवर्थ के अनुसार 'आज का बालक कल का पिता है।' के अनुसार बच्चों को प्रारम्भ से ऐसी शिक्षा दी जाए कि वह अनुशासित रहकर देश को आगे बढ़ाने में अपनी भूमिका अदा कर सके। 
हार और जीत का पहलू भी अनुशासन से जुड़ा है। हार और जीत सिक्के के दो पहलू हैं। आज जीत हुई है तो कल हार का भी सामना करना पड़ सकता है। इस बात को समझाते हुए हम बच्चों को जीवन में आने वाली चुनौतियों का सामना करना सिखाएं। अभ्यास द्वारा ही अनुशासन के पाठ को स्थायी बनाया जा सकता है। अनुशासित विद्यार्थी समय का पूर्णरूपेण पालन करते हुए शिखर को छू सकता है। अर्थात् अपनी मंजिल को पा सकता है। सुन्दर भविष्य वर्तमान की सुदृढ़ नींव पर ही टिका रहता है। यदि नींव मजबूत है तो इमारत अवश्य ही मजबूत होगी। जिस प्रकार कुम्हार मिट्टी को आकार देते हुए कई प्रकार के बर्तन  बनाता है। उसी प्रकार एक शिक्षक अनुशासन का पाठ पढ़ा विद्यार्थी को सही दिशा देकर उसका भविष्य उज्ज्वल बना सकता है।


लेखक परिचय :
लक्ष्मी जैन
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