ईसबगोल – एक औषधीय पौधा

धरती पर अनेक प्रकार के पेड़-पौधे पाये जाते हैं। सबमें कुछ न कुछ विशेषताएँ अवश्य पायी जाती हैं। उन्हीं पौधों में ऐसे कई औषधीय पौधे होते है, जो हमारे शरीर को अनेक रोगों से बचाते हैं, जिनमें से एक नाम 'ईसबगोल' का है। इसका वानस्पतिक नाम प्लान्टेगो ओवेटा है। यह प्लान्टेजिनसी कुल का कहलाता है।
     इसके पौधे पर गेहूँ की बालों की तरह श्वेत फूल लगते हैं। इसकी पुष्पकर्णिका में बीज होते हैं। ये बीज भूसी के समान दिखाई देते हैं।इनके बीजों को छीलने से ईसबगोल निकलती है। इसमें कोई सुगंध व स्वाद नहीं होता है।
   भारत इसका सर्वाधिक उत्पादन करने और निर्यात करने वाला देश है। भारत में इसकी खेती गुजरात, पंजाब एवं उत्तरप्रदेश में की जाती है। 
     ईसबगोल का उपयोग औषधीय रूप में किया जाता है। यह पेट की सफाई, कब्जियत, अल्सर, बवासीर, मुत्रसंस्थान, दस्त, आंव-पेचिस जैसी शारीरिक बीमारियों को दूर करने में काम आती है।
       इसकी खेती की सरल प्रक्रिया तथा अल्पावधि में फसल तैयार होने के कारण अधिकाधिक लाभ मिलता है। फसल की बिक्री के लिए इसका पर्याप्त बाजार उपलब्ध हो जाता है। भारत में औषधीय फसलों में एक ईसबगोल ही है, जिसका निर्यात में प्रमुख स्थान है। पानी सोखने की क्षमता के कारण इसकी भविष्य में शुष्क उद्यानिकी एवं शुष्क खेती हेतु प्रयुक्त किये जाने की भी बहुत सम्भावना है।
    ईसबगोल के बीजों में पिच्छिल द्रब्य ( म्युसिलेज) भी पाया जाता है। साथ ही इसमें रैमनोज एवं ग्लेक्टोज भी मिलता है। इसके बीजों में आकुबिन टेनिन भी पाया जाता है।
   यदि जड़ी-बूटी के पौधों का विकास, संरक्षण और उनकी खेती करने को प्रोत्साहित किया जाये, तो इनसे हमें सदैव लाभ प्राप्त होता रहेगा। औषधीय फसल की वैज्ञानिक विधि से खेती की जाये तो आर्थिक रूप से भी बहुत लाभ प्राप्त हो सकता है। हम देश में ही नहीं विदेशों में भी इसका निर्यात कर लाभ अर्जित कर सकते हैं। सरकार की ओर से भी अनेक योजनाएँ औषधीय फसल की खेती करने को लेकर चल रही है। हर्बल गार्डेन की भी स्थापना की जा रही है। औषधीय पौधों एवं बीजों की उपलब्धता सरकार की ओर से कृषकों को करायी जा रही है। इसके साथ ही शीघ्र ही अनेक और योजनाओं का प्रस्ताव होने वाला है। 

 


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