ISSN 2350-1014
आषाढ़ माह का प्रथम दिवस

आषाढ़ बनकर ही अधर के पास आना चाहता हूँ,
मैं तुम्हारे प्राणों का उच्छ्वास पाना चाहता हूँ।

आषाढ़, यानि धरती के आँचल को भिगोने की पहली तैयारी। 
      ग्रीष्म की विदाई का सन्देश लेकर आता है ये आषाढ़। फागुन के बाद और सावन से पहले लड़कपन और यौवन को अपने अन्दर समाहित ये माह, बारिश की नन्ही बूँदों से माटी और वातावरण को अपनी सोंधी खुशबू से भर देता है। ऐसी खुशबू जो जीवन को भी नई ताजगी से सराबोर कर जाता है।
      आषाढ़ माह का प्रथम दिवस धरती और अम्बर के मिलन का परिचायक है। जैसे कोई प्रिया लम्बे वियोग के उपरांत अपने प्रिय के हल्की सी छूवन से ही खिल उठती है, वैसे से ग्रीष्म के ताप से तड़पती धरती आषाढ़ की पहली बूंद से झूम उठती है। नन्हीं- नन्हीं बूँदें धरती पर यूँ थिरकती हैं मानो ये बूँदें धरती के आँचल पे नृत्य की जुगल बंदी कर रही हों। इस माह की महत्ता तो इसी बात से लगायी जा है कि ऐसे मनोरम दृश्य को देखकर ही कवि कालिदास ने 'मेघदूतम' की रचना  की होगी। बात जब रचनाओं की निकली ही है तो हम मोहन राकेश की एकांकी 'आषाढ़ का एक दिन' को  भूल नहीं सकते। इस एकांकी में कालिदास की महत्वाकांक्षा और मल्लिका के प्रेम में कितना जरुरी पात्र था ये आषाढ़ का प्रथम दिन। प्रेमरूपी वर्षा में भीगी मल्लिका मदमस्त प्रेम में टूटकर भी प्रेम को नहीं टूटने देने वाली नायिका एक अविस्मरणीय पात्र के रूप में हमारे सामने उजागर होती है यहीं सफलता और प्रेम में एक के द्वन्द से जूझते कालिदास एक रचनाकार और एक आधुनिक मनुष्य के मन की पहेलियों को सामने रखते हैं। 
    सच ही तो है आज के इस आधुनिक परिवेश में यदि बात प्रेम रूपी हल्की फुहारों की करें, तो अब मन यूँ नहीं भीगता।स्वार्थ, मानव मन को इतना सख्त बना चूका है कि अब ये नन्हीं बूँदें जाने कहाँ सोख लिये जाते हैं। ये फुहारें अब बस आँखों को आराम देतीं है, मन तो जैसे घनघोर वर्षा की प्रतीक्षा में लगा रहता है। ज्यादा की चाहत में अब हमें ये हल्की नन्हीं बुँदे ऊपर से स्पर्श कर के चल देतीं हैं।
     अब तो जैसे आषाढ़ भी दगाबाज हो गया है। अब वह भी सहमा-सहमा सा रहता है। उसके सहमने के पीछे कहीं न कहीं हम ही जिम्मेदार हैं। मनुष्य द्वारा प्रकृति के साथ किया गया अत्याचार ही इसका मूल कारण है। किन्तु सच्चे ह्रदय से मनन करें तो सच्चाई यही है कि प्रकृति हमारे भीतर आज भी कुलाँचे मारती हैं, हम आज भी उसका दुलार, उसका स्नेह, उसका ममत्व की ठंडी छाँव चाहते हैं।बस अब जरुरत है,निश्चल मन से खुले आकाश के नीचे आँखें बंद कर, इन नन्हीं बूँदों को अपने अन्दर समा देने की, खो जाने की, प्रेम में सराबोर हो जाने की। ठीक वैसे ही, जैसे मल्लिका के ह्रदय को छू गया था, आषाढ़ का प्रथम दिवस......

-नसरीन बानो 


- नसरीन बानो