ISSN 2350-1014

मेहमान अब नहीं आते

गाँव की दहलीज तक,
मेहमान अब आते नहीं।
झोलियों में; बच्चों के,
सामान तक लाते नहीं।।

'खास' किस्मों के फलों को,
झोले में लाते रहे 'वे',
आज-कल वो भूलकर भी,
'आम' तक लाते नहीं।।

दे दिलासा कह गये जो,
कल सुबह फिर आऊँगा।
दिन ढला जाता मगर 'वो',
शाम तक आते नहीं।।

कुछ पता चलता नहीं कि,
क्या? खता हमसे हुई।
आज कल अपनों से अपने,
दिले-राज बतलाते नहीं।।

स्वार्थ के चश्में लगाकर,
सब हुए अंधे 'रमन'।
कौन है? अपने पराये,
नजर में वो आते नहीं।।


लेखक परिचय :
राघव शर्मा
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