खुले आसमां में सोये थे कुछ शक्स इस तरह से
खुले आसमां में सोये थे कुछ शक्स इस तरह से ;
लिपट कर रो रहा हो बच्चा मां के आँचल में जिस तरह से
अध् नग्न था हर शक्स न लिबास था बदन पे,
बे हिसाब - बे सबब कहर जड़ों कि रात उन पे,
कहिं तो लाट कि चद्दर मखमल के बिस्तर हैं ;
किसी के बाप नेता हैं , तो मामा भी मिनिस्टर हैं ,
कहिं भूख़ बेबसी से कुछ लोग मर रहे हैं ;
कहिं गोदामों में भी बेहिसाब पैसे भी सड़ रहे हैं ,
कहिं मुरीद हो न जाना तुम जमाने के शान-वो-शौकत का ;
कि नाटक कर रही है दुनिया अश्लियत में इस तरह से ,
लिपट कर रो रहा हो बच्चा मां के आँचल में जिस तरह से ;
लिपट कर रो................................................................
