कैमरे की नजर से : मई 2015

बेतुकी इक धुन
काग़ज़ों में लिपटी
गीली, बैरंग उदासियाँ
गुमशुदा-से स्वप्न
लंबी इक डगर
सूना, अनजान सफ़र
कुछ शब्द अन-उकरे
काले बादलों में संघनित भरे
कुछ शुष्क हो, चरमराए
समय की चिलचिलाती धूप में
कुछ वाष्पित हो,
ढूँढा किए अपने निशाँ
उसी गहरे अंधियारे कूप में
इच्छाओं का बेबस समंदर
टूटी उम्मीदों की पतवार
वही मूरख कश्ती
सुनसान किनारे पर
आ लगी ज़िंदगी के
भौंचक, सहमे कदम
बीच राह ही, ठिठककर रह गये
अरमान गिरते रहे लफ्ज़ बन
कुछ अर्थों की तलाश में
मायूसी का नमक ओढ़
चुप ही सागर संग बह गये
और फिर भटके रास्ते
सोचा किये राही
क्यूँ जुड़ा कोई कहीं
उम्मीद जब कभी थी ही नहीं
प्रतीक्षित शब्द...........!
शब्द,रिक्त-स्थान,शब्द,
शब्द.....? शब्द.....??
आह! वही चिर-परिचित मौन
वही दर्दीला इंतज़ार
क्रम टूटा, बिखरा...खो गया
बढ़ता रहा, तितर-बितर हो
उसी नैराश्यता की ओर!
लय, राग-अनुराग से विमुख
गतिहीन जीवन, अलक्षित-सी सोच
समय से परे,
अंतहीन यादों के
अनियंत्रित ताबूत में
रोज़ ही एक मजबूर कील
खोदती जाती भीतर तक
खंडित स्मृतियों का कुँआ
गोते लगाती, डूबती-उतराती
कृत्रिम-मुस्कान के आवरण तले
अपने होने का भरम बनाती
हारती-टूटती ज़िंदगी
और है भी क्या
एक 'अतुकांत कविता' के सिवा !
