कवितालोक
कविता-
जिन आँखों में सूरत
संजोये थे तेरी
अब उनमें ही नींदों
के साए मिलेंगे
तू चाहे न चाहे
यूँ गाहे-बगाहे
किसी रास्ते पर
हम फिर से मिलेंगे
वही होंगी
चाँदनी की सर्द रातें
पर सूरज तले
अब अँधेरे मिलेंगे
यूँ मंजिल-ओ-मंजिल
हरम और दर पे
तू ढूंढेगा 'अनुराग'
को दर-बदर
तू चाहेगा हमसे
वही आशनाई
मगर हम न होंगे
न होगी खुदाई
जिन आँखों में सूरत
संजोये थे तेरी
अब उनमें ही नींदों
के साए मिलेंगे
