ISSN 2350-1014

चित्रकार

मैं तेज प्रकाश की आभा से
लौटकर छाया में पड़े कंकड़ पर जाता हूं
वह भी अंधकार में जीवित है
उसकी कठोरता साकार हुई है इस रचना में
कोमल पत्ते मकई के
जैसे इतने नाजुक कि वे गिर जाएंगे
फिर भी उन्हें कोई संभाले हुए है
कहां से धूप आती है और कहां होती है छाया
उस चित्रकार को सब कुछ पता होगा
वह उस झोपड़ी से निकलता है
और प्रवेश कर जाता है बड़े ड्राइंग रूम में
देखो इस घास की चादर को
उसने कितनी सुन्दर बनाई है
उस कीमती कालीन से भी कहीं अधिक मनमोहक।


लेखक परिचय :
डॉ. नरेश अग्रवाल
फो.नं. - +91 9334825981
ई-मेल - [email protected]