ISSN 2350-1014

तुम्हारा ऋण

रात जिसने दिखाये थे
हमें  सुनहरे सपने
किसी अजनबी प्रदेश के
कैसे लौटा पायेंगे
उसकी स्वर्णिम रोशनी

कैसे लौटा पायेंगे
चॉंद- सूरज को उनकी चमक
समय की बीती हुई उम्र
फूलों को खुशबू
झरनों को पानी और
लोगों को उनका  प्यार

कैसे लौटा पायेंगे
खेतों को फसल
मिट्टी को स्वाद
पौधों को उनके फल

ऐ! धरती तुम्हीं बताओ
कैसे चुका पायेंगे
तुम्हारा इतना सारा ऋण।

 


लेखक परिचय :
डॉ. नरेश अग्रवाल
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