ISSN 2350-1014

बिस्तर संख्या 43

अचानक दरवाजा  खुला  और एक युवक  अस्पताल के बिस्तर संख्या  43  के पास  लगभग दौड़ते हुए आया . .. /चेहरा बदहवास  ,,किसी  अनजाने भय  से आक्रांत ,,
उसके कपड़े  चुगली कर  रहे थे कि वो सीधे   दफ्तर  से  ही  अस्पताल आ गया है  . घर जाकर फ्रेश  होने और भोजन करने  की भी जरुरत  नहीं महसूस हुई  थी उसे ,
 वो स्टूल खींच कर  बैठ गया अपनी माँ के चेहरे के पास . ,,माँ के सर को सहलाया , चेहरे को थपथपाया ,, ह्रदय के पास हौले   से हाथ रखकर झकझोरकर  माँ को जगाने की  नाकाम कोशिश भी की उसने  ,
, पर माँ की आँखें न खुली ,,कोई हरकत नहीं हुई बदन में .यह देख  दर्द और अश्क का समंदर   लहरा उठा  बेटे की  आँखों में . वो उठ खड़ा हुआ . अपनी   बैचेनी को दबाने या आस - पास  के लोगों से छुपाने के लिए टहलने लगा  माँ के बिस्तर के ही इर्द- गिर्द .../
बच्चा     होता   तो चीखता  ,,चिल्लाता ,, कहता  --  ''  माँ उठो  ,, ऑंखें खोलो मुझे बात करनी है '' ..पर  ...बड़े होने  के अपने नुक़सान होते हैं , एक उम्र के बाद हम हर दर्द को जुबां नहीं दे सकते  /
अपनी लाचारी और  बेबसी को  छुपाने की भरसक कोशिश की उसने . पर सच्चे रिश्तों की तड़प कहाँ छुपती है .../बैठ गया वो माँ के पास  .. माँ के चेहरे की बिंदी को ठीक   किया ,, हाथों को सहलाने लगा जो शायद '' सलाइन वाटर '' चढाने  के क्रम में सूज गई थी ,,,,//
तकता  रहा  काफी  देर तक माँ के चेहरे  को  और बेचारी माँ .. बेटे की इस  बेबस  कोशिश से बेखबर थी या शायद  '' कोमा '' में //
 बचपन  में बेटे  की एक आवाज़  से जो  गहरी नींद से जाग जाती थी आज  मृत्युशय्या   पर  पड़ी  वही माँ बेटे  के  दर्द के चीत्कार से  बिलकुल   ही अनभिज्ञ थी ,, /
सच है मृत्यु  से ज्यादा  कड़वी हक़ीकत    कुछ भी नहीं  ................ //
कुछ मरीजों के पास मौत का इंतज़ार करने से ज्यादा युक्तिसंगत और तर्कसंगत कुछ होता भी नहीं .... /
पर  उनके अपनों के लिए  यह इंतज़ार  मौत से भी ज्यादा  दर्दनाक और तकलीफदेह होता है  ..........//


लेखक परिचय :
कल्याणी कबीर
फो.नं. - --
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