जश्न-ए-आज़ादी

एक है अपनी जमीं, एक है अपना गगन,
एक है अपना जहाँ, एक है अपना वतन।
अपने सभी सुख एक हैं, अपने सभी दुःख एक हैं,
आवाज़ दो, आवाज़ दो, हम एक हैं, हम एक हैं।

         त्यौहार यानि खुशियाँ मनाने की एक जीवन्त इकाई। राष्ट्रीय त्यौहार हो या धार्मिक, सदैव अपने साथ अपार खुशियाँ ही ले कर आता है। हमारा देश भारत, त्यौहारों का देश कहलाता है। जहाँ हर दिन हम किसी न किसी उत्सव को मनाने की तैयारियों में लगे रहते हैं।धर्मों की अनेकता के कारण हमारे देश में त्यौहारों के भी अनेक रूप देखने को मिल जाते हैं। धार्मिक पर्व, धर्म विशेष होने के बावजूद भी हम भारतीय उसे मिलजुल कर मानना ज्यादा पसंद करते हैं। और ऐसे में राष्ट्रीय पर्व की तो बात ही क्या......।
गर याद हो आप को वो बचपन की कुछ बातें,तो जाने क्यों, मुझे ऐसा लगता है कि हम सब का लड़कपन एक-सा ही होगा। ओह! वो तैयारियाँ। बस ये सुन लेना ही काफी था कि अमुक दिन ये पर्व है....फिर देख लो, चेहरे की ख़ुशी।

     उस समय हमारे लिए त्यौहार का मतलब ही था―नये-नये कपड़े, अच्छी-अच्छी मिठाइयाँ, तरह-तरह के पकवान और मित्रों के साथ खूब घूमना- फिरना। और यदि कोई राष्ट्रीय पर्व हो तो पूछो ही मत...। जितने हर्षौल्लास के साथ राष्ट्रीय पर्वों को विद्यार्थी जीवन में मनाया, वो उल्लास, उमंग अब देखने को नहीं मिलता। दो दिन पहले से ही कपड़ों की धुलाई, जूते-जुराबों की सफाइयों में लग जाते थे। एक रात पहले तो ख़ुशी से नींद ही नहीं आती थी। सुबह जल्द उठ कर फूलों की खोज में निकल पड़ते थे ताकि हम अपने ध्वज को सँवार सकें।अपनी पूरी ताकत लगाकर ऊँची-ऊँची आवाज़ों में राष्ट्रगान गाना , ध्वज को सलामी, परेड, नृत्य, गीत और वो अंत में मिष्ठान वितरण।
     अब हम काफी बड़े हो चुके हैं। शर्म आने लगी है। शायद अब हम आज़ादी का अर्थ ज्यादा ही समझने लगे हैं। शारीरिक मुक्ति हमें अधिक उन्मादित करता है जिस कारण हम भ्रम वश कहीं न कहीं मानसिक मुक्ति से वंचित रह जाते हैं। हम सब को पता है....स्वतंत्रता दिवस आने वाला है। मतलब किसी के लिए ये छुट्टी का एक दिन, तो किसी के लिए मात्र एक रस्म। जिसे पूरा करने के लिये हमें मज़बूरी वश अपने अन्दर आन्तरिक श्रद्धा लानी ही पड़ेगी, ताकि हम यह कह सकें कि हम भी भारतीय हैं।लाहौर, 15 अगस्त 1947, भारत की आज़ादी का ऐलान। और गाँधी जी ने कहा―“नम्र बनो। सत्ता से सावधान रहो। सत्ता भ्रष्ट कर देती है। याद रखो कि तुम अपने पद पर गरीब भारत के गाँवों की सेवा करने के लिए हो।” शांति और सौहार्द्र के इस पुजारी को भी अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी, ताकि देश में अमन और एकजुटता कायम रह सके। स्वतंत्रता की गूंज, भारतीयों के सोच को आज़ाद नहीं करा पायी थीं, नतीजा गोडसे की गोलियाँ, जिसने अपने उन्मुक्त ख्यालों के पाट को कभी खोलने ही नहीं दिया। संकीर्ण विचारों का दबदबा तब भी जोरों पर था और आज भी यूँही घूँघट लिये, संकुचाते हुए, हमारे दिल के किसी कोने में छुपा बैठा है, फिर भी हमें गर्व है कि हम आज़ाद हैं। जाने कौन से हदों की आज़ादी...
     कहीं आप ये न सोचने लगें कि उफ़! फिर वही प्रवचन। जो होश सँभालने से लेकर अब तक कानों में ठूँसा जा रहा है कि ― 'देश को आज़ाद करवाने में फलाँ-फलाँ देशभक्तों ने अपने प्राणों की आहुति दी, फलाँ ने ये किया......, फलाँ ने वो किया....। गर ऐसा है तो इसमें कोई आश्चर्य वाली बात नहीं, क्योंकि आज हर दूसरा इन्सान इसी सोच से ग्रसित लगता है।आज मानों जश्न-ए-आज़ादी, खुद को एक सच्चा देशभक्त साबित करने की कवायद मात्र रह गयी हो और हो भी क्यों न। मानव, सदैव उस वस्तु की अवहेलना करता आया है, जो उसे बिना किसी श्रम के ही प्राप्त हो जाया करती है। ये तो उस 'प्रसाद' के भांति है, जिसे हम किसी और की भक्ति व श्रद्धा का फल समझ,आपस में बाँट लिया करते हैं, जो मात्र हमारे लिए मौखिक स्वाद के अलावा और कुछ नहीं होता।

     सिर्फ आलोचना करूँ, ऐसा मेरा कोई उद्देश्य नहीं है। कुछ बातें दिल की भी हों। आज़ादी को लेकर युवाओं की सोच में बस थोड़ी स्पष्टता आ जाये, फिर देखो....अपना भारत। बहुत मुश्किल से पायी है हमने अपनी आज़ादी, इसे संजो कर रखना, हर भारतीय का कर्तव्य है। चलो कुछ ऐसा करें कि शुकून मिल जाये उन रूहों को , जिसने हँसते- हँसते हमारी आज़ादी के लिए अपनी जानें दे दीं। बस जरुरत है , एक आवाज़ की जो मिल कर एक साथ कहे― हम एक हैं और हर हाल में हम एक ही रहेंगे...........जयहिन्द!

―नसरीन बानो


- संपादक
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