कविता लोक

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1. गीत

[ नवम्बर 2016 | के. पी. अनमोल द्वारा लिखित ]
देखो पापा! दूर पहाड़ी पर बैठी इक चिड़िया गाती देख-देख के हरियाली वो इठलाती है सृष्टि के मनोरम दृश्यों पे मुस्काती है हौले-हौले गुनगुन करती कुछ कह जाती देखो पापा! दूर पहाड़ी पर बैठी इक चिड़िया गाती .....
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2. कवितालोक

[ नवम्बर 2016 | अनुराग बाजपेई द्वारा लिखित ]
कविता- जिन आँखों में सूरत संजोये थे तेरी अब उनमें ही नींदों के साए मिलेंगे तू चाहे न चाहे यूँ गाहे-बगाहे किसी रास्ते पर हम फिर से मिलेंगे वही होंगी चाँदनी की सर्द रातें पर सूरज तले अब अँधेरे .....
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3. स्त्री

[ जून-जुलाई 2015 संयुक्त अंक | लक्ष्मी जैन द्वारा लिखित ]
एक अनवरत संघर्ष जिसके साथ जूझ रही है हर सुबह हर शाम वो जलकर जी रही है उम्मीद की किरण लिए सफलता की आस लिए जीती जा रही है लेकिन अपनों से ही छली जा रही है ममता, प्यार व स्नेह की मूर्ति वो सहन करती है समय के थपेड़े वो जी को जलाकर सुकून देती है जिन्हें मंजिल पाने के लिए बढ़ती .....
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4. प्रहरी

[ जून-जुलाई 2015 संयुक्त अंक | राघव शर्मा द्वारा लिखित ]
मेरे तन को वसन नही‚ अम्बर साया बन जाता है। धरती के पावन आँचल की‚ ममता निधि लुट जाता है। जब हो जाये रात अँधेरी‚ तारे चाँद दीप्त चमकते हैं। जाग्रत की कुछ बात तुच्छ‚ वो तो भर रात टहलते हैं। हम कितने नादान सही‚ पाकर भी खोते चलते हैं। दूजे को बढ़ते हँसते हम‚ अपना .....
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5. तुम कौन हो

[ मई 2015 | बलजीत सिंह द्वारा लिखित ]
तुम कौन हो? किसी फिल्मी सितारे के नूरे नज़र तो नहीं हो और ना ही हो तुम किसी सुप्रसिद्ध लेखक के पोते – पड़पोते शायद पत्रकार भी नहीं होगे तुम यदि होते तो अवश्य ही सुना होता तुम्हारा नाम रेडियो पे पढ़ी होती अखबार के किसी पन्ने पर रंडीखाने पर छपी तुम्हारी कोई सनसनीखेज़ .....
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6. जिन्दगी

[ मई 2015 | मनीषा पराशर द्वारा लिखित ]
जिन्दगी,  ना तूने मुझे एक पल जीने दिया ना चैन से मरने दिया, तूने तो खूब खेल खेला मेरे साथ पर मुझे एक बार भी , खेल कर हराने तक का भी मौका ना दिया। जब भी लगा की तू संभल गयी है, एक भूचाल- सा ले आती थी, फिर तिनके भर सहारा बनकर तू ही मुझे बचाती थी । कभी लगता था मैं जीत गयी तुझसे, .....
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7. समय की झंझा में

[ मई 2015 | दिलीप कुमार सिंह द्वारा लिखित ]
समय की झंझा में जीवन के पात बिखर गये मैं था ‚ तुम थी चाँद और बदली भी वही थी पर न कसक थी‚ न आग्रह था न कोई उन्माद था‚ न कोई अभिव्यक्ति थी तुम भी चुप थी‚ मैं भी चुप था एक अव्यक्त लकीर थी जो जोड़ती थी हम दोनो को वो बीच से मिट गयी थी काश! कोई ऐसी लेखनी होती‚ जो उस मिटी लकीर में स्याही भरकर उसे .....
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8. ख्वाब

[ अप्रैल 2015 | बलजीत सिंह द्वारा लिखित ]
बहुत ख्वाब देखे तितलियों से ज्यादा रंगीन, अंधी रातों में झुरमुट-से निकलते हैं और मेरे मन की स्याह गलियों .....
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9. जेएनयू

[ अप्रैल 2015 | बलजीत सिंह द्वारा लिखित ]
वीराना चारों तरफ चीखता एकांत मेरे भीतर इमारतों को छूते विमान और इनका असहनीय शोर खो जाता भीतर चीखते सन्नाटे में यहाँ की सड़कें इमारतें, वृक्ष और इनके पत्ते सब खामोश हैं और यदि कोई चीखता है तो वह है मेरा अपना मन। महज़ इन तीन अक्षरों के लिए गँवा रहा .....
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10. गरीब

[ मार्च 2015 | अमिताभ विक्रम द्विवेदी द्वारा लिखित ]
लड़का और एक लड़की उम्र का कोई पता नहीं उनकी त्वचा से उम्र का पता नहीं चल रहा था कपड़े थे गंदे पर दाग अच्छे थे जैसे कि एक गरीब के होने चाहिए मांग रहे थे अपने जीने का हक अठन्नी, रुपया, दो रुपया उन्हें देख कोई सिकोड़ता था मुंह तो कोई अपनी जेब कोई देना चाहता था बिना भेदभाव किये .....
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11. संवाद

[ मार्च 2015 | अमिताभ विक्रम द्विवेदी द्वारा लिखित ]
जब हो जाता है बंद संवाद मनुष्यों से तो चल पड़ता है वह जंगलों में चाह नहीं उसे बुद्ध बनने की वह तो चाहता है अब जानवरों को दोस्त बनाना सीखना वहाँ के तौर-तरीके जो सीखाते हैं संघर्ष करना और जीना इस जंगल-राज में पर होते हैं कई मौनी-बाबा भी जो अपनाते हैं मध्यम मार्ग बंद कर देते .....
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12. गज़ल- कुछ तो है कहीं

[ फरवरी 2015 | प्रीति "अज्ञात" द्वारा लिखित ]
कुछ तो है कहीं, ये जो थोड़ा प्यार-सा है नशा है तेरा, चाहत या इक ख़ुमार-सा है मिला करता है मचलकर रोज ही तू मुझसे रहता बेवक़्त फिर भी तेरा इंतज़ार-सा है न बीता कोई भी लम्हा इस तरह पहले जिस तरह दिल अब मेरा बेक़रार-सा है महसूसा तुझे मुझमें ही कहीं हर मर्तबा बहता मेरी रग-रग में तेरा दीदार-सा .....
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13. हम शिक्षक भावी भारत के

[ फरवरी 2015 | महावीर सिंह गुर्जर द्वारा लिखित ]
हम शिक्षक भावी भारत के नित नव प्रज्ञा उपजायेंगे ज्ञान कृषि की फसलों पर हम अमृत रस बरसायेंगे। भारत की पावन गरिमा को अक्षुण्ण हमेशा रखना है मानवता के अरमानों को सबमें प्रेरित करना है। त्याग , प्रेम, बलिदान, समर्पण निज भारत को ही सब अर्पण .....
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14. बाधाओं को पार कर

[ जनवरी 2015 | डिम्पल गौर द्वारा लिखित ]
बाधाओं को पार कर  राही तुम बढ़ते जाना  कदम कदम पर होगी मुश्किल  फिर भी तुम ना घबराना | नयी सोच ,नए जज्बे से  नाविक, आगे चलते जाना  तूफानी लहरों से टकरा कर  साहिल तुमको है पाना | स्वप्न देखना  बुरा नहीं है ,मगर  पलकें न तुम मूंदना चिरनिंद्रा में रह कर बन्दे  सपनों को अपने न .....
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15. क्यूँ करती हूँ. ऐसा अक़सर

[ जनवरी 2015 | प्रीति "अज्ञात" द्वारा लिखित ]
सोचती हूँ, अक़्सर ही बैठी-बैठी  कि क्यूँ करती हूँ मैं, तुमसे बातें,  बातें जो एकतरफ़ा हैं, बेसिरपैर  की  बातें कुछ अनसुनी और अनुत्तरित ही...  जिनका कोई सरोक़ार ही नहीं  तुम्हारी दुनिया से, बेमानी हैं वो,  परे एकदम तुम्हारे अस्तित्व से  बेमतलब सी, बेतुक़ी, पागलपन भरी बातें.....   .....
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16. इस तरह नज़दीकियों का सिलसिला अच्छा नहीं

[ जनवरी 2015 | के. पी. अनमोल द्वारा लिखित ]
इस तरह नज़दीकियों का सिलसिला अच्छा नहीं रोज़ का मिलना-मिलाना बाख़ुदा अच्छा नहीं मसअले जो हैं हमारे बैठ के सुलझाएँ हम दो दिलों के बीच इतना फ़ासला अच्छा नहीं ज़ात-मज़हब कुछ नहीं है, बाँटने का काम है जो मनुज को बाँट डाले वो ख़ुदा अच्छा नहीं तू समझता है मुझे औ’ मैं समझता हूँ तुझे फिर हमारे बीच .....
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17. शब्द-सेतु

[ दिसम्बर 2014 | प्रीति "अज्ञात" द्वारा लिखित ]
तुम्हारे और मेरे बीच एक सेतु हुआ करता था जिस पर चल रोजाना ही  विश्वास की गहरी नींव और स्नेह-जल की फुहारों में गोता खाते हुए हमारे शब्द  मचलकर एक-दूसरे तक  पहुँच कैसे इठलाया करते थे. बहुत गुमान था, हमें कभी भी इसके न टूटने का यूँ तो था ये केवल अपना ही पर अपनेपन में, हमने गुजरने .....
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18. बस यही इत्मिनान है बाबा

[ दिसम्बर 2014 | के. पी. अनमोल द्वारा लिखित ]
बस यही इत्मिनान है बाबा के सफ़र में ढलान है बाबा हर क़दम पर सवाल उठ्ठेंगे ज़िन्दगी इम्तिहान है बाबा इक परिंदा कफ़स में' सोच रहा क़ैद क्यूँ आसमान है बाबा चीख जो आ रही है' मलबे से एक नंगा बयान है बाबा लूट में तुम अगर नहीं शामिल बंद फिर क्यूँ ज़ुबान है बाबा याद उसकी बिखर गयी मुझपे .....
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19. बेटी

[ दिसम्बर 2014 | विशाल वर्मा लखनवी द्वारा लिखित ]
       बेटी मेरी भी जमी है , है मेरा आसमा , मुझे भी जीने का अधिकार चाहिए माँ-पापा आप दोनों का थोड़ा सा प्यार चाहिए । न तोड़िए मुझे मैं नाजुक सी गुड़िया हूँ, मुझे भी माँ के आँचल से लिपटने का अधिकार चाहिए माँ-पापा आप दोनों का थोड़ा सा प्यार चाहिए । बेटी हूँ तो क्या , बेटे से कम .....
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20. ये क्या हो रहा है?

[ दिसम्बर 2014 | पूनम चन्द गोदारा द्वारा लिखित ]
ये क्या हो रहा है? मेरे इस सोने की चिडि़या के देश में।   क्यूं हो रही है सैंध इन ऋशियों के वेश में, क्या ये सभ्य मनुज कहलाने का जत्न है, या अपने पापों को छिपाने का एक प्रयत्न हैं, क्यूं लज्जित कर रहे हो हिन्द को इस वेश में, ये क्या हो रहा है? मेरे इस सोने की चिडि़या के देश में। या कहीं ऐसा .....
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