माँ

"जिस के दिल से माँ की मोहब्बत चली गई....
  समझो, उसके हाथ से जन्नत चली गई...."

         मनुष्य जन्म से ही रिश्तों के घेरों में घिरा रहता है, उन रिश्तों में सबसे छोटा शब्द रखने वाला रिश्ता "माँ" का है। माँ, शब्द जितना छोटा है, उसका एहसास उतना ही बड़ा। एक ऐसा एहसास, एक ऐसा शब्द, जिसके लिखते ही, बोलते ही, सुनते ही हृदय प्रेम से भर जाता है। चेहरे पर गर्व भरी मुस्कान और एक प्यारी-सी छवि। वो छवि जो जन्म के बाद, प्रथम दृश्या से ही मन- मस्तिष्क में समा जाती है। शायद इसीलिए माँ को संसार की श्रेष्ठ उपमाओं से नवाजा गया है।
      यूँ तो सालों भर कोई न कोई दिवस 'डे', जयंतियाँ मनायी जाती रहती है। मगर जब महिना मई का हो और दिवस 11 (ग्यारह), तो इस पावन दिन को नजरअंदाज करना, मानो स्वयं को कर्त्तव्यविहीन करने जैसा होगा। मातृ दिवस, माँ शब्द पर चर्चाएँ, सुन्दर-सा कार्ड, कोई तोहफा और मॉम 'आई लव यू' कह देना और एक कवायद पूरी। तरीका चाहे जो भी हो बात यहाँ अभिव्यक्ति की है। जिसका सम्पूर्ण जीवन ही प्रेम, स्नेह, समर्पण से पूर्ण हो, उसके लिए हमारा एक दिन का समर्पण ठीक है क्या? सही मायने में, ये तो उनके लिए है, जिनके पास अब अपनों के लिए समय नहीं रह गया।किन्तु अभी भी भारतीय समाज इतना दूषित नहीं हुआ कि उनके पास अपनी जननी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए साल का कोई एक दिन का इन्तजार करना पड़े, ये तो कुछ पश्चिमी रवायतें हैं, जिसे हमने बड़े प्यार से गले लगा लिया है। 
     वो कहते है न कि भगवान हर जगह नहीं होते, इसलिए उन्होंने संसार में माँ की रचना की। ताकि हम उनके साये में स्वयं को सुरक्षित महसूस कर सके, अपनी तकलीफें बता सकें। आज भी जब कोई दुःख, परेशानी, हमें सताने लगती है तो हमें पहला स्मरण माँ का ही आता है। खुशियों में भले ही उनकी यादें कुछ धूमिल हो जायें मगर कराहते हुए मुख से 'माँ' ही निकलता है। आज इस भाग-दौड़ भरी जिंदगी में जब हम खुद को थका, निराश, बोझिल महसूस करने लगते हैं, तो माँ का आँचल ही है जो हमें असीम शीतलता से भर देता है। क्या बात करूँ मैं माँ की....माँ तो जिन्दगी का लिबास है, दूध में घुली शक्कर की मिठास है। माँ पीड़ा में बजती संगीत की धुन है, लोरी सुनती भौरें की गुनगुन है। माँ तपती धूप में बादलों का साया है, माँ तो माँ है, यूँही नहीं कहा जाता कि माँ के पैरों तले जन्नत है।
     आज हम अपनी व्यस्तता के कारण रिश्तों की गरिमा को कहीं न कहीं खोते जा रहे हैं। आधुनिकता हम पर हावी होते जा रही है। आज मनुष्य के पास स्वयं के लिए भी समय नहीं है।शायद इसलिए ही ऐसे दिवस को मनाया जाने लगा, ताकि कोई एक दिन तो हो जब हम अपनों के लिए, उनके प्रति प्रेम व आभार व्यक्त कर सकें। आधुनिक होना अच्छा है, मगर आधुनिकता के कारण अपने नैतिक मूल्यों को नष्ट कर देना गलत है। 

ये सच है दोस्तों ! कि जो हमारे पास होता है, उसकी कीमत हमारे लिए कम हो जाती है। माँ के बारे में हम कितना भी कह दें, व्याख्यान दें, लेख लिखें, कविता लिखें,  कीमत तो वही बता सकते हैं जिन्होंने अपनी माँ को खो दिया है।

बहुत संभाला है तुम्हें, हो सके तो अब तुम संभल लो उन्हें...

 


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