प्रेरक विचार -जून 2014

1. कभी न सोचें कि यह कार्य मुझसे न होगा। मैं इस कार्य को करने में असमर्थ हूँ। मन में सदैव भावना रखें कि मैं इस कार्य को सुगमता से कर सकता हूँ। मैं इस कार्य को अवश्य करूँगा। कुछ बनने के लिए सदैव मन में उच्च विचार रखने होंगे। सदैव सोचें सफलता  पाना मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। इसे पाने से मुझे कोई भी वंचित नहीं कर सकता है। इस कार्य को मैं करने में समर्थ हूँ। मैं करूँगा, मंजिल दूर सही, परन्तु मैं मंजिल तक पहुंचकर ही दम लूँगा।

2. आदर्श चरित्र वाला व्यक्ति अपने पद की गरिमा बनाए रखता है। वह अपने साथियों व अधीनस्थ ऐसे कर्मचारियों का चुनाव करता है जो कि उसके विचारों के अनुकूल ही सोचते हों। वह प्रत्येक वस्तु में श्रेष्ठता को खोजता है और उन्हें एकत्र करने जा प्रयत्न करता है। वह अपने साथ योग्य, श्रेष्ठ व आदर्श चरित्र वाले लोगों को रखता है।

3. कार्य करना ही जीवन का नियम है। कर्म ही हमें मुक्ति देता है। कर्म ही हमें पतन के गर्त में गिरने से बचता है। मनुष्य अपनी ऊँची से ऊँची आकांक्षा की पूर्ति कर्म द्वारा कर सकता है। कर्म न करने वाला व्यक्ति आलसी व साहसहीन हो जाता है, उसकी दक्षता को जंग लग जाता है। कर्म करने से बचने वाला व्यक्ति कभी भी सुख प्राप्त नहीं कर सकता है। सुख और कर्म दोनों जुड़वां भाई हैं, इन्हें परस्पर एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता है।

4. जो व्यक्ति अपने आदर्श को प्राप्त करने का प्रयत्न नहीं करता है, वह कभी भी अपने सर्वोच्च लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल नहीं हो सकता है। वह जीवन में सदैव असफल ही रहता है।

5. अभिलाषा करना और कुछ बनकर सफल होकर दिखाना दोनों भिन्न-भिन्न हैं, जैसे–धरती व आकाश में अंतर है। केवल सोचना और इच्छाएँ करने से कुछ नहीं होता है। इससे गाड़ी मंजिल पर नहीं पहुँच सकती है। उद्देश्य-पूर्ति के लिए, कुछ करने के लिए , सफलता-प्राप्ति के लिए पूरी क्षमता सहित कार्य में जुट जाना होगा। जीवन में एक प्रयोजना मुख्य होना चाहिए। 


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