ISSN 2350-1014

बस यही इत्मिनान है बाबा

बस यही इत्मिनान है बाबा
के सफ़र में ढलान है बाबा

हर क़दम पर सवाल उठ्ठेंगे
ज़िन्दगी इम्तिहान है बाबा

इक परिंदा कफ़स में' सोच रहा
क़ैद क्यूँ आसमान है बाबा

चीख जो आ रही है' मलबे से
एक नंगा बयान है बाबा

लूट में तुम अगर नहीं शामिल
बंद फिर क्यूँ ज़ुबान है बाबा

याद उसकी बिखर गयी मुझपे
धूप में सायबान है बाबा

दिख रहा जो वही हक़ीक़त है
तुम को' क्या-क्या गुमान है बाबा

पास अनमोल कुछ नहीं मेरे
बस ख़ुदा मेहरबान है बाबा


लेखक परिचय :
के. पी. अनमोल
फो.नं. - 08006623499
ई-मेल - [email protected]