गज़ल- कुछ तो है कहीं
कुछ तो है कहीं, ये जो थोड़ा प्यार-सा है
नशा है तेरा, चाहत या इक ख़ुमार-सा है
मिला करता है मचलकर रोज ही तू मुझसे
रहता बेवक़्त फिर भी तेरा इंतज़ार-सा है
न बीता कोई भी लम्हा इस तरह पहले
जिस तरह दिल अब मेरा बेक़रार-सा है
महसूसा तुझे मुझमें ही कहीं हर मर्तबा
बहता मेरी रग-रग में तेरा दीदार-सा है
छू गयी आकर कुछ ऐसे ये दस्तक तेरी
इन साँसों में ही इस जीस्त का दरबार-सा है
तू ही सुकून, है ख़्वाहिश, चैनो-अमन मेरा
मेरी हर नब्ज़ को समझता, चारागार-सा है
