तमाम खुशियों में शामिल ग़मों का डेरा है ।

तमाम खुशियों में शामिल ग़मों का डेरा है ।
इस चकाचौंध के पीछे घना अँधेरा है ।

ख्वाहिशें इन गुलों की की सज न सकीं ।
हर तरफ वहशत-ए- हवस का घेरा है ।

मुस्कराहट की चाशनी है मेरे दर्दों पर ।
सुबह की लाली में रिसता हुआ खूं मेरा है ।

घर में फिर से नयी दीवार ना उठने पाए ।
झोपड़ी में रहें माँ बाप फिर घर तेरा है ।

तुम्हारी एक जफ़ा ने हुनर कैसा ये दिया मुझको ।
आह को मिलने लगी 'वाह ' कि शुक्र तेरा है ।


लेखक परिचय :
योगेन्द्र कुमार पाठक
फो.नं. ---
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