बस यही इत्मिनान है बाबा

बस यही इत्मिनान है बाबा
के सफ़र में ढलान है बाबा

हर क़दम पर सवाल उठ्ठेंगे
ज़िन्दगी इम्तिहान है बाबा

इक परिंदा कफ़स में' सोच रहा
क़ैद क्यूँ आसमान है बाबा

चीख जो आ रही है' मलबे से
एक नंगा बयान है बाबा

लूट में तुम अगर नहीं शामिल
बंद फिर क्यूँ ज़ुबान है बाबा

याद उसकी बिखर गयी मुझपे
धूप में सायबान है बाबा

दिख रहा जो वही हक़ीक़त है
तुम को' क्या-क्या गुमान है बाबा

पास अनमोल कुछ नहीं मेरे
बस ख़ुदा मेहरबान है बाबा


लेखक परिचय :
के. पी. अनमोल
फो.नं. -08006623499
ई-मेल - kpanmol.rke15@gmail.com
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